Friday, February 04, 2011

ये तो पत्‍थर तोड़ते थे, पुलिस ने इन्‍हें क्‍यों तोड़ा

 

ये तो पत्‍थर तोड़ते थे, पुलिस ने इन्‍हें क्‍यों तोड़ा

लेनिन रघुवंशी

मेरा नाम रघूलाल, उम्र-23 वर्ष, पुत्र-श्री बिंदा बिंद। मैं गाँव-सागर सेमर, पोस्ट-हिनौती, थाना-पड़री, जिला-मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) का निवासी हूँ। मैं पत्थर तोड़ने का काम करता हूँ, महीना में 10-15 दिन काम मिलता है। हमारे परिवार में चार सदस्य हैं-मैं और मेरी पत्नी उर्मिला, दो लड़का-लवकुश (3 वर्ष) व आशीष (1 वर्ष)।

हमारे साथ जिंदगी में यह पहली घटना घटी जिससे मैं शारीरिक व मानसिक रूप से क्षमता विहीन हो गया। उस घटना के कारण घर से बाहर निकलने में डर लगता है। अब काम-काज करने का हिम्मत ही नही करता। हमेशा चिन्ता व डर बनी रहती है कि दुबारा फिर से हमारे साथ अमानवीय व्यवहार व मार-पीट न किया जाए। इसलिए किसी से बातचीत करने में भी डर लगता है।

पुरवा हवा चलने पर पूरे शारीर में दर्द उठने लगता है, अब परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है। रात में जब नींद टूट जाती है तो फिर नींद ही नही आती. सारी रात यह सोचते-सोचते कट जाती है कि जो मेरे साथ हुआ उससे अच्छा मर जाना ही उचित था।

हुआ यह कि मैं 28 मई, 2009 को अपने ससुराल साले जी की शादी में ग्राम-बहरामागंज, पोस्ट व थाना-चुनार, जिला-मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) गया था। 29 मई को लगभग 10 बजे रात में हम बाजार से ससुराल (घर) चलने वाले थे कि चुनार थाना के जीप पर सवार वहाँ के दरोगा व सिपाही आये, हमें उठाकर गाड़ी में बिठा लिया। अचानक इस हरकत से मैं घबरा गया। रात का समय था, डर के मारे मैं उनसे कुछ पूछ भी नही सका। चोरी हुई जगह और मेरे घर घुमाते-फिराते थाना में लगभग 2.00 बजे रात में पहुँचे। उस समय 2 बल्ब दरोगा के कमरे में तथा तीन बाहर में जल रहे थे। हवालात में बल्ब नहीं था। हमें उसी हवालात में बंद कर दिया गया। कुछ समय बाद दो रोटी और सब्जी हमें भोजन के लिये दिया गया। अभी भोजन किये ही थे कि हमें फिर दो सिपाही हथकड़ी लगाकर बाहर लाये और जीप में बिठा दिया, यहाँ से वे लोग हमें सुदर्शन दरोगा के आराम करने वाले कमरे पर ले आये. वहाँ पर पहले से ही थाना से सम्बन्धित दो लोग उपस्थित थे। यहाँ से जीप में बिठाकर वे पाँचों लोग हमें डगमगपुर स्थित एक फैक्ट्री के पास ले गये और हमें डराते व धमकाते हुये पूछा कि बताओं तुम्हारे साथ कौन-कौन लोग थे। वह एक सुनसान क्षेत्र है. रात में पूरा सुन-सपाटा छाया हुआ था। डर के मारे पुरा शरीर पसीना से लथपथ  हो गया था. डर लग रहा था कि कही मारकर फेंक न दे। आज भी वह दिन याद करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। डराने व धमकाने के लगभग आधे घंटे बाद चुनार चौकी के समीप ही बिहारी ढ़ाबा है, वहाँ ले आये. अपने लिये वे लोग चाय मंगवाये और हमें कांच की गिलास में दारू पीने के लिये दिया। हमने कभी शराब नहीं पी थी. जब हमने शराब पीने के लिये मना कर दिया, तब गाली देते हुए सिपाही आया व मारने लगा और दूसरा सिपाही जबरदस्ती मुँह में लगाकर हमें दो गिलास शराब पिला दिया। उस समय हम मर जाना उचित समझते थे और यह ठीक भी रहता। शराब पिलाने के बाद उसी समय और लोगों के घर छापा मारा गया तथा 12 लोगों को पकड़ा। उसमें से कई लोग हमारे गांव व इलाके के रहने वाले थे।

30 मई, 09 को दिन में लगभग 12 बजे दरोगा हमें अपने दफ्तर में बुलाया तथा हमारे साथ मार-पीट करने लगा, हमारी दायां हथेली पर कुर्सी रखकर उस पर बैठ गया तथा बोला कि बताओ डकैती का समान कहाँ है, कौन-कौन से लोग इसमें शामिल हैं। हम बेकसुर थे. हम कुछ नही जानते थे. इसलिए हमने कुछ नहीं बोला., तब दरोगा ने सिपाहियों को बुलाया, सिपाही हमें कमरा के बाहर लाये तथा कम्पाउड में डंडे से पिटाई करने लगे तथा चोरी का हामी भरा रहे थे। सर छोड़कर पूरे शरीर पर आगे-पीछे, बेरहम की तरह पिटाई करने लगे. जिससे दांये हाथ के अंगूठा में जबरदस्त चोट आई, जो आज तक सूजा हुआ है। कुर्सी से कुचलने के कारण हथेली के ऊपरी हिस्से पर निशान अभी भी है तथा सूजा हुआ है। उस समय तो हम डर गये थे कि हथेली का हड्डी टूट गया है, लेकिन एक्स-रे करवाने पर पता चला कि हड्डी नहीं टूटी है, तब जाकर थोड़ा राहत महसूस हुआ। मार-पीट के बाद वे लोग हमें हवालात में डाल दिये। दिन भर हमें खाना भी नही दिया. शाम को 4 बजे घर से खाना आया तब खाना खाये। उसी दिन लगभग डेढ बजे रात में फिर सुदर्शन दरोगा अपने निवास पर बुलाया. कहा कि झूठ या सच कुछ तो बताओ? वहाँ पर हमें लगभग डेढ घंटे रखा.  उसके बाद सिपाही को बुलाया तथा हमें थाना ले जाने को बोला। वहीं पर सिपाही ने हमें दो डंडे मारे तथा जीप में बिठाया. जीप में हमें मारते हुए थाने ले आया। हवालात के सामने लगातार डंडे की बारिश हमारे ऊपर करने लगे. जब हम गिर गये तब हवालात में 15 कैदियों के साथ बंद कर दिया। रात में खाना भी नहीं दिया।

अगले दिन फिर दरोगा अपने कार्यालय में बुलाया तथा थाना परिसर में रखी पत्थर पर बैठने को बोला, जो चारो-ओर से बिजली के तार से घिरा हुआ था. बैठने के बाद हमें दो बार बिजली का करेंट लगाया और करेंट देने लगा। उसी समय मेरा भाई ओम प्रकाश समोसा लेकर आया था. होमगार्ड ने उसे समोसा देने से मना किया तथा बोला कि इसके लिए चना और लाई लेते आओं। जब भाई खाने का समान दे रहा था, उस समय हम केवल इतना बोले कि हमें पानी-पिला दो, अब जिंदगी का कोई पता नही। उसने हमें पानी पिलाया। इसके बाद हमें तीसरी बार करेंट दिया, जिसके कारण हम बेहोश हो गये।

पाँच दिन बाद जब हमें होश आया, अपने को मैं सरकारी जिला अस्पताल मिर्जापुर में लेटा पाया. यह देखकर हम अचम्भित हो गये। हाथ के इशारा से मैंने अपने जीजा जी से पूछा, तब वे बोले कि आपकी हालत खराब हो गई थी, इसलिए आपको भर्ती किया गया है। दो दिन तक हमें कुछ याद नहीं रहा। बाद में धीरे-धीरे पता चला कि हमारे साथ पुलिस वाले क्या-क्या किये हैं।

सप्ताह भर हम अस्पताल में रहे, उसके बाद घर आये। पुलिस वाला हमें पूछने तक नहीं आये।  बाद में हमें पता चला कि लोगों ने चुनार व डगमकपुर के चौराहे पर चक्का जाम किया था. पडरी थाना के दरोगा जी व क्षेत्रीय विधायक भी हमसे अस्पताल में मिलने आये थे। अखबार वाले भी आये थे, जिन्होंने हमारी हालात व चुनार दरोगा के मनबढ़ी व अत्याचार पर खबर अखबार में छापे थे। बंदी के दौरान चुनार के दरोगा सुदर्शन हमारे ससुर श्री लक्ष्मण व भाई (जीतू) से 13,000 रुपये हमें छोड़ने के एवज् में लिया था।

मिर्जापुर अस्पताल में भर्ती होने के पहले हमें चुनार क्लिनिक में भर्ती करवाया गया था, जहाँ डाक्टरों ने हमारी स्थिति नाजूक देखते हुए मिर्जापुर जिला अस्पताल भेजने को बोला था। तब क्षेत्रीय विधायक जी के कहने पर एम्बुलेंस से मिर्जापुर अस्पताल लाया गया था. वहां हमारा सर व हाथ का एक्स-रे भी हुआ था।

बायीं तरफ पीछे की हिस्सो में दर्द अभी भी है। हमारे घर से पुलिस जो समान उठाकर ले गई थी, वह मिल गया है, लेकिन जो समान पटेल परिवार ले गये जैसे-हसुली पायल, बल्ला: नहीं मिला है।

मारपीट का याद आने पर मर-जाना उचित लगता है। अभी जब हम आपके कार्यालय आ रहे थे, तो बगल वाली जो मंदिर है वहाँ पुलिस को देखकर अंदर से सहम गये थे, मेरा मुँह सुखने लगा था।

जब से अस्पताल से आये हैं, घर छोड़कर कहीं नहीं जाते, एक-दो बार केवल दवा-ईलाज हेतु बाबू जी के साथ ही गये हैं। अपनी कहानी कहने व सुनाने के बाद डर पैदा होता है। दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही हो. जिससे वह भी सीख लें कि नाजायज व गैर कानूनी तरीकों से आम आदमी के साथ इस तरह से अमानवीय ढ़ंग से मार-पीट व गाली गलौज न करें। पटेल परिवार जो हमें डकैती में फँसाया है,  उसे भी दण्ड मिले।

आपको कहानी सुनाकर व यहां आकर धीरे-धीरे अब डर कम होने लगा है। गाँव व क्षेत्र में मेरी कहानी पढ़ी जाए। मार-पीट के कारण जो इज्जत गयी है, वह लौट तो नहीं सकती, लेकिन सभी हमारी कहानी को जाने कि पुलिस कैसे बेगुनाह के साथ अमानवीय व्यवहार करती है। दुनिया जाने की पुलिस का असली चेहरा क्या है तथा अखबार एवं समाचार में मेरा कहानी पढ़ा एवं प्रसारण किया जाय। अभी जब आपने हमारी कहानी पढ़कर सुनायी, हमें बहुत अच्छा लगा तथा अब पहले से बेहतर व अच्छा महसूस कर रहा हूँ.

उपेन्द्र कुमार से बातीचत पर आधारित

डॉ0 लेनिन रघुवंशी 'मानवाधिकार जन निगरानी समिति' के महासचिव हैं और वंचितों के अधिकारों पर इनके कामों के लिये इन्‍हें 'वाइमर ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', जर्मनी एवं 'ग्वांजू ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', दक्षिण कोरिया से नवाज़ा गया है. लेनिन सरोकार के लिए मानवाधिकार रिपोर्टिंग करेंगे, ऐसा उन्‍होंने वायदा किया है. उनसे pvchr.india@gmail.com पर संपर्क साधा जा सकता है.

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Thursday, February 03, 2011

पुलिसिया यातना की शिकार की ख़ुदबयानी

http://www.blogger.com/post-create.g?blogID=17884293

पुलिसिया यातना की शिकार की ख़ुदबयानी
समय Feb 02, 2011 | 5 टिप्पणियाँ

लेनिन रघुवंशी

मेरा नाम रीना (बदला हुआ नाम), पत्नी श्री विनोद कुमार गुप्ता, मकान नं0-137, मोहल्ला-सिपाह, थाना-कोतवाली, जौनपुर की निवासनी हूँ। मेरे पति ड्राइवरी का काम करते हैं। 24 जनवरी की सुबह लगभग 4.30 से 5.00 बजे पुलिस आयी और मेरे पति विनोद को ले गयी। उस वक्त मेरा बेटा मेरी गोद में था। इस तरह अचानक बिना किसी वजह से मेरे पति को पुलिस द्वारा ले जाने के कारण मुझे लगने लगा था कि हमारे परिवार के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट चुका है। मैं इतनी घबरा गई थी कि मुझे इस मुसीबत से निकलने का कोई रास्ता नही सूझ रहा था। पहले मुझे लगा कि पुलिस मामूली पूछ-ताछ करके छोड़ देगी। लेकिन पति के वापस न आने के बाद मेरी और मेरी अम्मा (सास) की हालत ख़राब हो गयी। मेरी अम्मा तो बार-बार बेहोश हो जा रही थी। दोपहर में आस-पड़ोस के लोग इकठ्ठा हुए और सांत्वना दी और कहा कि इतना सीधा लड़का कहा फँस गया। मोहल्ले वालों की सलाह पर मैं और मेरी अम्मा मेरे पति के सेठ जी के घर भी मिलने के लिए गये, ताकि किसी तरह मेरे पति पुलिस हिरासत से छूट जायें। लेकिन इस मामले में उन्होंने किसी तरह की मदद करने से इंकार कर दिया।
12 फरवरी, 2010 की रात 10 बजे सेठ SOG को लेकर हमारे घर पर आये और घर में रखे तीन मोबाइल फोनों को अपने कब्जे में ले लिया। पुलिस ने हमारे कमरे के पूरे समान की तलाशी ली। मैने एक पर्स में पायल और लगभग 3000 – 4000 रुपये बचाकर रखे थे। उनके जाने के बाद सुबह मैनें पर्स देखा तो पर्स में सिर्फ पायल ही मिली, जबकि सारे पैसे ग़ायब थे।

10 मिनट बाद वो दोबारा आये। उस वक़्त मैं घर पर अकेली थी। मेरी अम्मा और देवर, बड़े पापा (मेरे ससुर के भाई) को बुलाने गये थे। मुझे यह बताने में बेहद शर्म महसूस हो रही है कि घर में मुझे अकेला देखकर एक पुलिस वाला मेरे साथ बदतमीजी करने लगा और मुझे गन्दी-गन्दी गालियां देने लगा। उस वक़्त वो पुलिस वाला शराब के नशे में धुत्त था, उसके मुंह से शराब की बदबू आ रही थी।

पुलिसिया मार के डर से मेरे पति ने घर में एक अमरूद के पेड़ के नीचे रिवाल्वर छुपाये होने की बात कबूल की। पुलिस ने मेरे पति को लेकर रिवाल्वर खोजने के लिए खुदाई शुरू की। उसी बीच फिर वहीं खड़े एक पुलिस वाले ने मेरे पास आकर फिर से बदतमीजी की और मेरी अम्मा से बार-बार कहने लगा कि तुम्हे टॉयलेट जाना है तो जाओ। वह लगातार मेरी सास को अपशब्द बोले जा रहा था। उसने मुझे जूते की नोंक से मारा भी। मुझे गाली देते हुए उसने कहा कि ‘‘तुम्हे यही मिला था शादी करने के लिए’’ और मेरी अम्मा से पूछा कि कहां से लायी है इसे। सरायमीर का नाम सुनते कि उसने मेरी इज्जत को तार-तार करते हुए कहा कि इसके ऊपर न जाने कितने मुसलमान चढ़े होंगे।

जनता की सुरक्षा के लिए काम करने वाली पुलिस के बुरे व्यवहार की हद तो तब हो गई जब उन लोगों ने मेरी अम्मा को भी अपमानित करना शुरू कर दिया। वो मेरी अम्मा को कह रहे थे कि ‘इतना बदमाश लड़का पैदा करने के लिए तु तो चार-पाँच लोगो के पास तो गयी होगी। उन्होंने मुझे यह भी कहा कि तुम्हारे गुप्तांग में इतनी जो़र से मारेंगे कि तुम्हारी बच्चेदानी बाहर आ जायेगी। इतना कहते हुए उन लोगो ने मेरी साड़ी खींचने की कोशिश की। प्रतिरोध करने पर उन लोगों ने हमारी अम्मा को फिर से जूते की नोंक से मारा और धमकी दी कि तुम्हारे खानदान में किसी को नही छोड़ूंगा। सबको बेइज्जत करूँगा।

उन्होंने मेरे पति के सामने कहा कि तुम्हारी बीवी को यहीं तुम्हारे सामने सुलाकर शारीरिक सम्बन्ध बनायेंगे। उस समय मुझे लगा कि अपनी इज्जत बचाने के लिए हम कहां भागें, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। इस बात को याद करके अभी भी डर लगता है और खुद को शर्म महसूस होती हैं। उन लोगों ने मेरे पति को कमरे में ले जाकर बहुत मारा। वो लोग मेरे पति को इतनी बुरी तरह पीट रहे थे कि मार की आवाज बाहर तक आ रही थी। वो लोग मेरी अम्मा और देवर को ले जा रहे थे, उन्होंने मुझे भी चलने को कह, लेकिन मैनें कहा कि मेरा बच्चा सो रहा है तो उन लोगो ने मुझे छोड़ दिया।

मेरा एक बच्चा तीन साल का है और दूसरा अभी गर्भ में है। अभी यही चिन्ता रहती है गुजारा कैसे होगा, 18 फरवरी को पुलिस ने मेरे पति को छोड़ दिया। हम लोगों को यही डर है कि कहीं सेठ फिर से पुलिस के साथ हमारे घर न आ जाये और हमें दोबारा इस तरह से गाली-गलौज और मार न सहनी पड़े। चिंता की वजह से आजकल खाने पीने का बिल्कुल मन नही करता है। अभी घर में कोई काम काम करने वाला नही है। इस घटना के बाद देवर और ससुर का काम भी छूट गया है।

डर के कारण मेरे परिवार के सभी सदस्य एक ही जगह सोते हैं। मेरे पति इतने डरे हुए हैं कि टॉयलेट भी अकेले नहीं जाते हैं। मेरे पति और अम्मा को रात में नींद नहीं आती है, और अगर आती भी है तो डर के मारे वो नींद में ही चिल्लाने लगते हैं। पुलिस मेरे पति को लेकर मेरे बहन के घर आजमगढ़ गयी और मेरे पति से बोला कि तुम भागो, तुम्हारा इनकाउन्टर कर देंगे।

पुलिस इनको लेकर मेरे मामा, भाभी और सभी रिश्‍तेदारों के यहां गयी और उन्हें धमकाया भी। इतने अत्याचार और शोषण को सहन करने के बाद हमें न्याय का इंतज़ार है और वापस हम लोग खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर सकें।

रेणू और शबाना से बातचीत पर आधारित

डॉ0 लेनिन रघुवंशी 'मानवाधिकार जन निगरानी समिति' के महासचिव हैं और वंचितों के अधिकारों पर इनके कामों के लिये इन्‍हें 'वाइमर ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', जर्मनी एवं 'ग्वांजू ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', दक्षिण कोरिया से नवाज़ा गया है. लेनिन सरोकार के लिए मानवाधिकार रिपोर्टिंग करेंगे, ऐसा उन्‍होंने वायदा किया है. उनसे pvchr.india@gmail.com पर संपर्क साधा जा सकता है. Tags: police attrocity, uttar pradesh

" पुलिसिया यातना की शिकार की ख़ुदबयानी " को 5 प्रतिक्रियाएँ
shabnam khan says:
02/02/2011 at 3:18 pm
यह पढने के बाद क्या कहू कुछ समझ नहीं पा रहीं हूँ…लेकिन यह सच है कि पुलिस के बेहद दबंगई रवैये के कारण गरीब लोगों को अधिक अत्याचार सहने पड़ते है…उनकी सुनने वाला भी कोई नहीं होता…इसका समाधान क्या हो ये तो सब जानते हैं लेकिन कैसे हो यह समझ नहीं आता…
बेहद शर्मनाक…

Ravindra says:
02/02/2011 at 4:08 pm
Yeh kis tarah ke desh me rah rahe hain hum log???

Irshad Ahmed says:
02/02/2011 at 5:59 pm
It is very seamful incident in the worlds largest democratic country.This incident show injustice & najis attitude in INdia.

अमृत पाल सिंह says:
02/02/2011 at 9:05 pm
पुलिसिया रवैया बेहद शर्मनाक है। उम्मीद है कि सरोकार के माध्यम से यह मामला कई लोगों तक पहुचेंगा और इस मामले में पीडितों को उचित न्याय मिल पायेगा, ताकि पुलिसिया दबंगई के कारण भारत में गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को परेशानियां ना सहनी पडें….

khadija siddiqui says:
02/02/2011 at 11:11 pm
is lekh ko padkar mujhe aisa bilkul bhi nahi laga ki hum kis desh me rah rahe hain ya hamare ki kya stithi ho gayi hai jaisa ki aur logon ne kaha.mera manna hai ki hamare desh ki aisi stithi to shuru se hi hai.azadi se pahle bhi gharibon aur mazloomon ke sath zulm o zyadti had se zyada hoti thi aur azadi ke bad bhi unke sath kuch nahi badla hai,hindustan me azadi to sirf un logon ko mili hai jo sarkar se jud gaye phir chahe wo rajniti ho ya naukri.sarkari nakri har kisi ke hisse me nehi aa sakti aur neta har koi nahi ban sakta.phir teesre tabqe ke wo log hain jo in donon ke talwe chatte hain aur is bahane un logon ka bhi bhala ho jata hai balki curruption me wo ek ahm bhumika ada karte hain.sarkari naokron me rahi baat police ki,kahne me to wp janta ki naukar hai lekin hamesha malik hone ka rale ada kiya aur malik bhi aisa jo sirf atyachar karna janti hai,be-izzat karna janta hai aur marna janti hai.shuru se hi dekha jaye to police ko kabhi janta ke humdadrd ke roop me nahi dekha gaya,hamesha wo netaon ki hathon ki kathputli bani rahi.agar wo apna farz nibhana janti to na kabhi koi bombay hota na godhra hota aur aisi hi aur bhi tamam cheezen,mai kis kis ka nam lu.aur jo apna farz nibhate hain to shayad wo karkare ki tarah se apwaad hain.mujhe sharm aati hai desh ki police waywastha par

पुलिसिया यातना की शिकार की ख़ुदबयानी

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पुलिसिया यातना की शिकार की ख़ुदबयानी
समय Feb 02, 2011 | 5 टिप्पणियाँ

लेनिन रघुवंशी

मेरा नाम रीना (बदला हुआ नाम), पत्नी श्री विनोद कुमार गुप्ता, मकान नं0-137, मोहल्ला-सिपाह, थाना-कोतवाली, जौनपुर की निवासनी हूँ। मेरे पति ड्राइवरी का काम करते हैं। 24 जनवरी की सुबह लगभग 4.30 से 5.00 बजे पुलिस आयी और मेरे पति विनोद को ले गयी। उस वक्त मेरा बेटा मेरी गोद में था। इस तरह अचानक बिना किसी वजह से मेरे पति को पुलिस द्वारा ले जाने के कारण मुझे लगने लगा था कि हमारे परिवार के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट चुका है। मैं इतनी घबरा गई थी कि मुझे इस मुसीबत से निकलने का कोई रास्ता नही सूझ रहा था। पहले मुझे लगा कि पुलिस मामूली पूछ-ताछ करके छोड़ देगी। लेकिन पति के वापस न आने के बाद मेरी और मेरी अम्मा (सास) की हालत ख़राब हो गयी। मेरी अम्मा तो बार-बार बेहोश हो जा रही थी। दोपहर में आस-पड़ोस के लोग इकठ्ठा हुए और सांत्वना दी और कहा कि इतना सीधा लड़का कहा फँस गया। मोहल्ले वालों की सलाह पर मैं और मेरी अम्मा मेरे पति के सेठ जी के घर भी मिलने के लिए गये, ताकि किसी तरह मेरे पति पुलिस हिरासत से छूट जायें। लेकिन इस मामले में उन्होंने किसी तरह की मदद करने से इंकार कर दिया।
12 फरवरी, 2010 की रात 10 बजे सेठ SOG को लेकर हमारे घर पर आये और घर में रखे तीन मोबाइल फोनों को अपने कब्जे में ले लिया। पुलिस ने हमारे कमरे के पूरे समान की तलाशी ली। मैने एक पर्स में पायल और लगभग 3000 – 4000 रुपये बचाकर रखे थे। उनके जाने के बाद सुबह मैनें पर्स देखा तो पर्स में सिर्फ पायल ही मिली, जबकि सारे पैसे ग़ायब थे।

10 मिनट बाद वो दोबारा आये। उस वक़्त मैं घर पर अकेली थी। मेरी अम्मा और देवर, बड़े पापा (मेरे ससुर के भाई) को बुलाने गये थे। मुझे यह बताने में बेहद शर्म महसूस हो रही है कि घर में मुझे अकेला देखकर एक पुलिस वाला मेरे साथ बदतमीजी करने लगा और मुझे गन्दी-गन्दी गालियां देने लगा। उस वक़्त वो पुलिस वाला शराब के नशे में धुत्त था, उसके मुंह से शराब की बदबू आ रही थी।

पुलिसिया मार के डर से मेरे पति ने घर में एक अमरूद के पेड़ के नीचे रिवाल्वर छुपाये होने की बात कबूल की। पुलिस ने मेरे पति को लेकर रिवाल्वर खोजने के लिए खुदाई शुरू की। उसी बीच फिर वहीं खड़े एक पुलिस वाले ने मेरे पास आकर फिर से बदतमीजी की और मेरी अम्मा से बार-बार कहने लगा कि तुम्हे टॉयलेट जाना है तो जाओ। वह लगातार मेरी सास को अपशब्द बोले जा रहा था। उसने मुझे जूते की नोंक से मारा भी। मुझे गाली देते हुए उसने कहा कि ‘‘तुम्हे यही मिला था शादी करने के लिए’’ और मेरी अम्मा से पूछा कि कहां से लायी है इसे। सरायमीर का नाम सुनते कि उसने मेरी इज्जत को तार-तार करते हुए कहा कि इसके ऊपर न जाने कितने मुसलमान चढ़े होंगे।

जनता की सुरक्षा के लिए काम करने वाली पुलिस के बुरे व्यवहार की हद तो तब हो गई जब उन लोगों ने मेरी अम्मा को भी अपमानित करना शुरू कर दिया। वो मेरी अम्मा को कह रहे थे कि ‘इतना बदमाश लड़का पैदा करने के लिए तु तो चार-पाँच लोगो के पास तो गयी होगी। उन्होंने मुझे यह भी कहा कि तुम्हारे गुप्तांग में इतनी जो़र से मारेंगे कि तुम्हारी बच्चेदानी बाहर आ जायेगी। इतना कहते हुए उन लोगो ने मेरी साड़ी खींचने की कोशिश की। प्रतिरोध करने पर उन लोगों ने हमारी अम्मा को फिर से जूते की नोंक से मारा और धमकी दी कि तुम्हारे खानदान में किसी को नही छोड़ूंगा। सबको बेइज्जत करूँगा।

उन्होंने मेरे पति के सामने कहा कि तुम्हारी बीवी को यहीं तुम्हारे सामने सुलाकर शारीरिक सम्बन्ध बनायेंगे। उस समय मुझे लगा कि अपनी इज्जत बचाने के लिए हम कहां भागें, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। इस बात को याद करके अभी भी डर लगता है और खुद को शर्म महसूस होती हैं। उन लोगों ने मेरे पति को कमरे में ले जाकर बहुत मारा। वो लोग मेरे पति को इतनी बुरी तरह पीट रहे थे कि मार की आवाज बाहर तक आ रही थी। वो लोग मेरी अम्मा और देवर को ले जा रहे थे, उन्होंने मुझे भी चलने को कह, लेकिन मैनें कहा कि मेरा बच्चा सो रहा है तो उन लोगो ने मुझे छोड़ दिया।

मेरा एक बच्चा तीन साल का है और दूसरा अभी गर्भ में है। अभी यही चिन्ता रहती है गुजारा कैसे होगा, 18 फरवरी को पुलिस ने मेरे पति को छोड़ दिया। हम लोगों को यही डर है कि कहीं सेठ फिर से पुलिस के साथ हमारे घर न आ जाये और हमें दोबारा इस तरह से गाली-गलौज और मार न सहनी पड़े। चिंता की वजह से आजकल खाने पीने का बिल्कुल मन नही करता है। अभी घर में कोई काम काम करने वाला नही है। इस घटना के बाद देवर और ससुर का काम भी छूट गया है।

डर के कारण मेरे परिवार के सभी सदस्य एक ही जगह सोते हैं। मेरे पति इतने डरे हुए हैं कि टॉयलेट भी अकेले नहीं जाते हैं। मेरे पति और अम्मा को रात में नींद नहीं आती है, और अगर आती भी है तो डर के मारे वो नींद में ही चिल्लाने लगते हैं। पुलिस मेरे पति को लेकर मेरे बहन के घर आजमगढ़ गयी और मेरे पति से बोला कि तुम भागो, तुम्हारा इनकाउन्टर कर देंगे।

पुलिस इनको लेकर मेरे मामा, भाभी और सभी रिश्‍तेदारों के यहां गयी और उन्हें धमकाया भी। इतने अत्याचार और शोषण को सहन करने के बाद हमें न्याय का इंतज़ार है और वापस हम लोग खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर सकें।

रेणू और शबाना से बातचीत पर आधारित

डॉ0 लेनिन रघुवंशी 'मानवाधिकार जन निगरानी समिति' के महासचिव हैं और वंचितों के अधिकारों पर इनके कामों के लिये इन्‍हें 'वाइमर ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', जर्मनी एवं 'ग्वांजू ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', दक्षिण कोरिया से नवाज़ा गया है. लेनिन सरोकार के लिए मानवाधिकार रिपोर्टिंग करेंगे, ऐसा उन्‍होंने वायदा किया है. उनसे pvchr.india@gmail.com पर संपर्क साधा जा सकता है. Tags: police attrocity, uttar pradesh

" पुलिसिया यातना की शिकार की ख़ुदबयानी " को 5 प्रतिक्रियाएँ
shabnam khan says:
02/02/2011 at 3:18 pm
यह पढने के बाद क्या कहू कुछ समझ नहीं पा रहीं हूँ…लेकिन यह सच है कि पुलिस के बेहद दबंगई रवैये के कारण गरीब लोगों को अधिक अत्याचार सहने पड़ते है…उनकी सुनने वाला भी कोई नहीं होता…इसका समाधान क्या हो ये तो सब जानते हैं लेकिन कैसे हो यह समझ नहीं आता…
बेहद शर्मनाक…

Ravindra says:
02/02/2011 at 4:08 pm
Yeh kis tarah ke desh me rah rahe hain hum log???

Irshad Ahmed says:
02/02/2011 at 5:59 pm
It is very seamful incident in the worlds largest democratic country.This incident show injustice & najis attitude in INdia.

अमृत पाल सिंह says:
02/02/2011 at 9:05 pm
पुलिसिया रवैया बेहद शर्मनाक है। उम्मीद है कि सरोकार के माध्यम से यह मामला कई लोगों तक पहुचेंगा और इस मामले में पीडितों को उचित न्याय मिल पायेगा, ताकि पुलिसिया दबंगई के कारण भारत में गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को परेशानियां ना सहनी पडें….

khadija siddiqui says:
02/02/2011 at 11:11 pm
is lekh ko padkar mujhe aisa bilkul bhi nahi laga ki hum kis desh me rah rahe hain ya hamare ki kya stithi ho gayi hai jaisa ki aur logon ne kaha.mera manna hai ki hamare desh ki aisi stithi to shuru se hi hai.azadi se pahle bhi gharibon aur mazloomon ke sath zulm o zyadti had se zyada hoti thi aur azadi ke bad bhi unke sath kuch nahi badla hai,hindustan me azadi to sirf un logon ko mili hai jo sarkar se jud gaye phir chahe wo rajniti ho ya naukri.sarkari nakri har kisi ke hisse me nehi aa sakti aur neta har koi nahi ban sakta.phir teesre tabqe ke wo log hain jo in donon ke talwe chatte hain aur is bahane un logon ka bhi bhala ho jata hai balki curruption me wo ek ahm bhumika ada karte hain.sarkari naokron me rahi baat police ki,kahne me to wp janta ki naukar hai lekin hamesha malik hone ka rale ada kiya aur malik bhi aisa jo sirf atyachar karna janti hai,be-izzat karna janta hai aur marna janti hai.shuru se hi dekha jaye to police ko kabhi janta ke humdadrd ke roop me nahi dekha gaya,hamesha wo netaon ki hathon ki kathputli bani rahi.agar wo apna farz nibhana janti to na kabhi koi bombay hota na godhra hota aur aisi hi aur bhi tamam cheezen,mai kis kis ka nam lu.aur jo apna farz nibhate hain to shayad wo karkare ki tarah se apwaad hain.mujhe sharm aati hai desh ki police waywastha par

Wednesday, February 02, 2011

Report on movement of testimonial struggle in India

Please find the enclosed annual progress report 2010 of the project Promoting psycho –legal framework to reduce torture and organized violence in India

Annual Progress 2010

Fwd: Threat and abusing call



---------- Forwarded message ----------
From: UP Police Computer Cetre Lucknow <uppcc-up@nic.in>
Date: Wed, Feb 2, 2011 at 10:17 AM
Subject: Fwd: Threat and abusing call
To: DIG Police ComplaintCell Lucknow <digcomplaint-up@nic.in>
Cc: PVCHR ED <pvchr.india@gmail.com>


Sir
The complaint from above email is being forwarded to your kind attention and response.
UPPCC


---------- Forwarded message ----------
From: PVCHR ED <pvchr.india@gmail.com>
To: uppcc@up.nic.in
Date: Wed, 02 Feb 2011 09:33:07 +0530
Subject: Threat and abusing call

Sir/Madam,

 

Greeting from Varanasi.

 

My name is Shruti Nagvanshi and residence of SA 4/2 A, Daulatpur, Varanasi,India.

 

I am working for rights of marginalized on grass root and managing trustee of Peoples' Vigilance Committee on Human Rights (PVCHR).

 

I received the call from +91-7499245228 to my mobile number Number +91-9935599330 nearly at 7.01 PM.I was at Narendra computers, Ghausabad,Varanasi. 

 

He offered the friendship first. I just avoided. He immediately started to abuse in very nasty manner. All his abuses are against the dignity of a woman. Then he cut the call. Again I called on his number and asked to him for reason of abuse. But he gain abused in very bad way. He knows my name also.

 

I am suffering with psychological stress. Please do needful for rule of law.

 

With regards,

Shruti Nagvanshi

 

PVCHR/JMN
Mobile:+91-9935599330
Hatred does not cease by hatred, but only by love; this is the eternal rule.
--The Buddha
 
"We are what we think. With our thoughts we make our world." - Buddha
 
 
This message contains information which may be confidential and privileged. Unless you are the addressee or authorised to receive for the addressee, you may not use, copy or disclose to anyone the message or any information contained in the message. If you have received the message in error, please advise the sender by reply e-mail to pvchr.india@gmail.com and delete the message. Thank you.


Threat and abusing call

Sir/Madam,

 

Greeting from Varanasi.

 

My name is Shruti Nagvanshi and residence of SA 4/2 A, Daulatpur, Varanasi,India.

 

I am working for rights of marginalized on grass root and managing trustee of Peoples' Vigilance Committee on Human Rights (PVCHR).

 

I received the call from +91-7499245228 to my mobile number Number +91-9935599330 nearly at 7.01 PM.I was at Narendra computers, Ghausabad,Varanasi. 

 

He offered the friendship first. I just avoided. He immediately started to abuse in very nasty manner. All his abuses are against the dignity of a woman. Then he cut the call. Again I called on his number and asked to him for reason of abuse. But he gain abused in very bad way. He knows my name also.

 

I am suffering with psychological stress. Please do needful for rule of law.

 

With regards,

Shruti Nagvanshi

 

PVCHR/JMN
Mobile:+91-9935599330
Hatred does not cease by hatred, but only by love; this is the eternal rule.
--The Buddha
 
"We are what we think. With our thoughts we make our world." - Buddha
 
 
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