| लोकतंत्र, अधिकार, विकास...कभी सुना है? | |||||||||||||||||||||||
रेखा का बच्चा कुपोषित है. रेखा के शरीर में ख़ून की कमी है और बहुत मुश्किल से वो हमारे सामने बैठ पाती है. सूखी टाँगों और मुश्किल से खुलती आँखों वाले माँ-बेटे की आंखों में लोकतंत्र का एक अलग मायने दिखाई देता है. रेखा सोनभद्र ज़िले की राबर्ट्सगंज लोकसभा सीट के घसिया बस्ती गाँव की रहने वाली है. ज़िला मुख्यालय से महज़ तीन किलोमीटर के फ़ासले पर स्थित इस गाँव में भूख और कमज़ोरी से 18 बच्चे मर चुके है. तीन महीने पहले के सर्वेक्षण में 43 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं. दिल्ली में सत्ता के गलियारों के गिर्द घूमते हुए जो लोकतंत्र हमें दिखाई देता है, उससे अलग एक और तस्वीर है दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की. यह लोकतंत्र रेखा और विशाल की सच्चाई वाला है. करोड़ों लोग इसी लोकतंत्र में जीने को मजबूर हैं. अजूबा स्मारक
विकास और जनसेवा के प्रमाण के लिए सरकारें स्मारक बनाती हैं, बड़े-बड़े शिलान्यास करती हैं पर इस गाँव में घुसते ही दिखता है भूख से मरे 18 बच्चों का स्मारक, भारतीय लोकतंत्र की एक कड़वी नंगी सच्चाई को बेपर्दा करता हुआ. गाँव की एक महिला, फूलमती बताती हैं, "हम इलाहाबाद गए थे एक कार्यक्रम में. घर में बच्चों के खाने के लिए कुछ नहीं था इसलिए जाना ज़रूरी था. इस बीच मेरी लड़की ने एक बच्चे को जन्म दिया था पर हमारे पहुँचने से पहले वो और बच्चा मर चुके थे. लड़की को कुछ खाने को नहीं मिलने के कारण ख़ून की कमी और कमज़ोरी थी. इलाहाबाद वालों ने भी कार्यक्रम का पैसा नहीं दिया. पैसे से गए और बच्चों से भी." वर्ष 2001 में इस गाँव में भूख से मौतों को सिलसिला शुरू हुआ. जब एक-एक करके 18 बच्चे मर गए तब प्रशासन की नींद खुली पर गाँव के लोग कहते हैं कि राहत फिर भी नहीं मिली. आज भी 43 कुपोषित बच्चों, महिलाओं में ख़ून की कमी, पीने की बूँद-बूँद को तरसता, बिना स्कूल, स्वास्थ्य सेवा और रोज़गार के यह गाँव विकास, लोकतंत्र, नागरिक अधिकार जैसे शब्दों को सुनकर चौंक रहा है. कलाकारों की बस्ती
तकलीफ़ तब और बढ़ जाती है जब पता चलता है कि यह कोई सामान्य गाँव नहीं, घसिया आदिवासियों का वो गाँव है जिसमें राष्ट्रीय स्तर के समारोहों में शामिल होने वाले करमा आदिवासी नृत्य के कलाकार बसते हैं. राजीव गांधी और बाद के कई नेताओं के साथ लंच, डिनर कर चुके, देश के कई हिस्सों, आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्रों, नाट्य अकादमियों के मंच पर प्रस्तुतियाँ दे चुके गजाधर घसिया से मैंने पूछा कि चुनाव माने क्या..? गजाधर घसिया कहते हैं, "हम चुनाव से क्या समझें. वोट माँगने लोग आते हैं. बड़े बड़े नेता... लेकिन काम के लिए कोई सुनवाई नहीं है. हम कलाकार हैं, पर दाने-दाने को मोहताज हैं. बच्चे भूख से मर गए. हम भी ऐसे कब तक जिएँगे. सरकार यह समझती ही नहीं है कि ग़रीबी क्या होती है. हम क्या खाते हैं, कैसे जीते हैं. कैसे मरते हैं." गजाधर की यह व्यथा कथा इस गाँव के 65 घरों की सच्चाई है. 400 की आबादी वाले इस गाँव के लोग झाड़ू बनाकर, मज़दूरी करके अपना गुज़र-बसर करते हैं. जंगलों में रह रहे इन आदिवासियों ने अब से क़रीब 11 साल पहले इस जगह को अपना डेरा बनाया. वो भूख और ग़रीबी का मार झेल रहे थे. काम खोजते और रोटी, स्वास्थ्य पाने के लिए ये लोग यहाँ आए. पर बदले में जो स्थिति है, वह और भी दर्दनाक है. जंगलों में वापस जाने का विकल्प छिन चुका है. यहाँ अब तक सुविधाओं के न्यूनतम स्तर के लिए संघर्ष जारी है. सुखन के चार बच्चे हैं. एक बच्चा भूख से मर चुका है. वो कहते हैं, "जब वोट का मौक़ा आता है तो नेता लोग बहला फुसलाकर वोट ले लेते हैं. अधिकारी भी आते हैं पर वोट के बाद जब रोज़गार, सुविधा माँगने जाते हैं तो अपमान के सिवाय कुछ नहीं मिलता. पढ़े-लिखे लोग केवल फुसलाते हैं. झूठा आश्वासन देते हैं." 'काम नहीं माँगा होगा'
गांव के कई युवाओं का रोज़गार गारंटी कार्ड बना हुआ है पर आज तक उन्हें काम नहीं मिल सका है. कई बार शिकायत करने पर भी. पर ज़िले के अपर ज़िलाधिकारी (एडीएम) हमसे कहते हैं कि उन्होंने काम माँगा ही नहीं होगा, इसीलिए काम नहीं मिला. गाँव में सरकारी सुविधाओं के नाम पर केवल एक हैंड पम्प है जिसमें पानी नहीं आता. एक आंगनबाड़ी केंद्र है जिसे गांव के लोगों ने समाजसेवी संगठनों के सहयोग से बनाया है. इसमें आंगनबाड़ी का कार्यक्रम चल रहा है. स्कूल अबतक नहीं था. एक समाजसेवी संस्था की ओर से इस गांव से स्कूल का निर्माण करा दिया गया है पर प्रशासन अबतक पढ़ाई शुरू नहीं करा पाया है. गांव से पहली बार वोट डाल रहे विजय कुमार घसिया से हमने पूछा कि किस भरोसे के आधार पर वोट देंगे. किसे चुनना है इस चुनाव में. वो सोच में पड़ जाते हैं. कहते हैं, "अब क्या कहें... कोई समझ में नहीं आता. जो घर दे, रोज़गार दे, उसे ही देंगे पर मिले तब न." विजय को नहीं मालूम कि यह चुनाव दिल्ली के लिए है या लखनऊ के लिए. किस पार्टी का क्या मतलब है और कौन क्या कहता, करता है. उसे बस आस है कि कभी कोई नेता उसकी भी सुध लेगा. विजय की इसी महीने शादी हुई है. अब उसका नया घर बसा है पर लोकतंत्र की छाँव उसके गाँव पर नहीं पड़ती. गृहस्थी झुलसती नज़र आती है. ज़िले के और आला अधिकारी चुनाव की तैयारियों में लगे हैं. हमसे बात करने के लिए तैयार नहीं है. ख़ासकर इस मुद्दे पर. चुनाव के समय में घसिया बस्ती की कहानी छोटे से एक इलाक़े की कहानी है पर लोकतंत्र की एक बानगी यह भी है. बानगी पूरे बर्तन की कहानी कहती है. घसिया बस्ती का सच लोकतंत्र की राह देख रहा है शायद...
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Wednesday, April 22, 2009
लोकतंत्र, अधिकार, विकास...कभी सुना है?
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